गुरुवार, 30 जुलाई 2009

प्यासा पथिक

प्यासा पथिक

जेठ की चिलचिलाती धूप...
गर्म हवाएं, तपती सड़क...
उस पर चल रहा...
एक पथिक.....
बेचैन है अपनी मंजिल तक
पहुचने के लिए...
रास्ते से कुछ दूर...
एक अकेला वृक्ष...
रुकता है पथिक थोडी देर....
सता रही है उसे प्यास...
लेकिन पानी कहाँ है?...
पास का कुआँ तो सूखा है...
"जब पानी ही नहीं होगा तो कैसे जियेंगे हम?".......
यही सोचता.....
अपनी मंजिल की ओर
फिर चल देता है
"प्यासा पथिक"
वल्लभ.....मार्च, सन् १९९०

4 टिप्‍पणियां:

Abhinav Akaash ने कहा…

aapki sabhi kaviyaten ek hee patern par likhi gai hain....achchha prayaas hai....kab likhi ye kavitayen? ab bhi likhte hain? ...... Abhinav Akaash, Ranchi

Suman ने कहा…

nice

दिगम्बर नासवा ने कहा…

लाजवाब लिखा है .... सच में अदूरी प्यास ही पानी के बिना

ashakashi ने कहा…

Thanks to all,
Abhinav! mai scince ka vidyarthi raha,bachpan se hee abhaav ko paas se dekha aur mahsoos kiya hai,
ye adhikansh kavitayen B.Sc. (E C College, Allahabad) ke dauran varsh 1989-1991 me likhi gai hai. 1992 me aajeevika ke chakkar me jo fasa to aaj tak lekhni band hi hai....vallabh