शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

बेरोजगार

"बेरोजगार"

ट्रेन से कटी....
एक युवक की लाश ....
वहीँ पास में पड़ा एक छोटा बैग.......
घेरा बनाए हुए भीड़....
अपना अपना विचार दे रहे लोग...
ऐसा रहा होगा, वैसा रहा होगा...
तभी पुलिस आयी.....
बैग खोला गया...
तमाम डिग्रियां और प्रमाणपत्र...
पता चला युवक डबल एम ए था ...
एक सुसाइड नोट भी था....
लिखा था....
"आज जहाँ इंटरव्यू था...
वहां की रेट भी वही थी...
पचास हज़ार रूपये...
अब मुझे कहीं काम नहीं मिलेगा...
नहीं सह सकता अब और ताने....
नहीं जी सकता अब बन कर....
"बेरोजगार"
वल्लभ.....जुलाई, सन् १९९०

2 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

सच, आज का एक सच्चा मगर दुखद पहलु अच्छा पिरोया आपने शब्दों में !

govind ने कहा…

Vartaman Samye mein jo paristhiti ban rahi usaka anubhav bahut achhe shabdon mein vyqakt kiya