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गुरुवार, 30 जुलाई 2009

प्यासा पथिक

प्यासा पथिक

जेठ की चिलचिलाती धूप...
गर्म हवाएं, तपती सड़क...
उस पर चल रहा...
एक पथिक.....
बेचैन है अपनी मंजिल तक
पहुचने के लिए...
रास्ते से कुछ दूर...
एक अकेला वृक्ष...
रुकता है पथिक थोडी देर....
सता रही है उसे प्यास...
लेकिन पानी कहाँ है?...
पास का कुआँ तो सूखा है...
"जब पानी ही नहीं होगा तो कैसे जियेंगे हम?".......
यही सोचता.....
अपनी मंजिल की ओर
फिर चल देता है
"प्यासा पथिक"
वल्लभ.....मार्च, सन् १९९०