सुदूर का गाँव... पीपल पाकड़ की छाँव .... पगडण्डी वाला रास्ता... बिना तार के बिजली के खम्भे ... टपकती छत वाला बिना मास्टर का प्राईमरी स्कूल... कभी न खुलने वाला... जच्चा बच्चा केन्द्र... कभी कभी खुलने वाली... राशन की दूकान.... पुश्तैनी बाहुबली.... प्रधान .... बदहाल मजदूर, किसान.... गुल्ली- डंडा खेलते, नंगे बदन बच्चे.... नयेपन का अभाव... स्थिर सा जीवन.... फ़िर भी है विश्वास.... कभी जरूर होगा.... हमारे गाँव का... " समग्र विकास" ................... वल्लभ ( मई १९९०)